Sunday, April 6, 2014

जन्नत की हकीकत !

प्रिय साथियो,

विगत दो दिन से जो कुछ घटा उसमे या तो मैं आपको ठीक से समझा नहीं पाया या शायद आप समझ नहीं पाए. या गलती शायद माध्यम की थी. क्यूंकि मैंने माध्यम ट्विटर को चुना जो एक साथ ज्यादा बात लिखने नहीं देता. इसलिए इस ब्लॉग के माध्यम से कोसिस करके देख रहा हूँ. ज्यादा लिख नहीं पाता, आज लिखूंगा तो गलतियाँ भी होंगी. नजरंदाज कीजियेगा.

पिछले तीन चार साल से देश रोज भार्स्ताचार के नए किस्से सुन रहा था. अन्ना आन्दोलन के रूप में एक झोंका आया जो बदलाव की उम्मीद लाया. जल्दी समझ आने लगा की आन्दोलन बड़ा मकसद हल नहीं कर सकता, तो आन्दोलनकारी राजनीती की तरफ मुड़े. सिर्फ मुड़े नहीं बल्कि हवाओं का रुख भी तेजी से मुड़ने लगा. वर्षों की चुप्पी आवाज़ में बदली. आवाज़ का वाहन बनी एक नयी पार्टी.

नयी पार्टी अगर पुराने ढर्रे पे चलती तो शायद(यक़ीनन) पैर नहीं जमा पाती. पार्टी को बाकी पार्टियों से अलग दिखना जरुरी था. पार्टी ने ताबड़तोड़ तरीके से काम शुरू किया. प्रतिदिन जो हो रहा था वो अपर्त्याशित था. लोगों में विश्वास भी जागने लगा था की बदलाव अब सिर्फ सपना नहीं रहेगा. इस नयी पार्टी में बहुत कुछ ऐसा था जो उम्मीदें जगाता था. सबसे मुख्य बिंदु ये थे

1. पार्टी मजबूत जनलोकपाल (अन्ना-अरविन्द वाला) के लिए प्रतिबद्ध दिखी
2. पार्टी स्वराज लाने को आतुर दिखी
3. पार्टी धर्म और जाती की राजनीती से उपर दिखी
4. पार्टी चुनाव साफ़ धन से लड़ने का वादा कर रही थी


समय आगे बढ़ा, कई घटनाएँ घटी, छोटी भी और मोटी भी, जिनको नजरंदाज भी कर सकते हैं या फिर नहीं भी कर सकते, ये आपके नजरिये पर है. उपरोक्त में से सबपे पार्टी आज कहाँ कड़ी है इस्पे एक एक करके चर्चा करना चाहूँगा

 मजबूत जनलोकपाल (अन्ना-अरविन्द वाला)

कांग्रेस और अन्य पार्टियाँ संसद में लोकपाल का कैसे मजाक उडा रही थी ये सबको पता है. लगभग उसी दोरान उत्तर भारत के खूबसूरत पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के तात्कालिक मुख्यमंत्री भुवन चंद खंडूरी ने इसको गंभीरता से लिया. उनकी छवि एक इमानदार और कड़क CM ली पहले से थी. उन्होंने अन्ना और अरविन्द से संपर्क किया, सलाह ली और उनकी रजामंदी से एक मजबूत लोकायुक्त बिल पास किया. कुछ समय बाद वो सत्ता से बहार हो गए.

समय बदला और आन्दोलनकारियों की पार्टी मैदान में आ गयी. जन्लोक्पल का दावा किया पर चुनाव में खंडूरी के खिलाफ ही उम्मीदवार उतार दिया. अगर यह पार्टी सच में मजबूत जनलोकपाल (अन्ना-अरविन्द वाला) के लिए गंभीर है तो कम से कम खंडूरी की इज्जत की जानी चाहिए थी.

मैंने विरोध जताया तो साथियों ने कहा की क्यूंकि वो बीजेपी में हैं इसलिए उनके खिलाफ उम्मीदवार उतारा गया. अगर वो "आप" में आयें तो उनका स्वागत किया जायेगा.

पहली बात, जब वो जनलोकआयुक्त पास कर रहे थे तब भी वो बीजेपी में थे. मतलब की वो बीजेपी में रहते भी अच्छे काम कर सकते हैं.

दूसरी बात, आज भी अरविन्द या कोई और साथी उनकी कोई कमी नहीं निकल पाया. मतलब की उनका विरोध सिर्फ इसलिए हो रहा है की उन्होंने "आप" हाई कमांड की जगह "बीजेपी" हाई कमांड की गुलामी मजूर कर रखी है. मैंने गुलामी शब्द क्यूँ इस्तेमाल किया इसकी चर्चा आगे करूँगा.

तीसरी बात, आप को चाहिये था की आप खंडूरी की मजबूत करके दूसरी पार्टी में अच्छे आदमी को जितने में मदद करते. आखिर आप राजनीती करने नहीं बल्कि बदलने आये थे.

इस सारे घटनाकर्म से मुझे व्यक्तिगत तोर पर लगता है की जनलोकपल पिछले तीन साल से मार्केटिंग टूल बना हुवा है, इसके लिए कोई गंभीर नहीं है.


स्वराज

अर्थ आप जानते हैं. फिर भी दोहराता हूँ. अपना राज. लोगों का राज. फैसलों में व्यापक भागीदारी. विकेन्द्रीयकरण.

आसान भाषा में, मेरे गाँव से जुड़े फैसले मेरे गाँव के लोग लें, मेरे जिले ले फैसले मेरे जिले के लोग लें. ये फैसले कम से कम दिल्ली से ना थोपे जाएँ.

अगर पार्टी स्वराज लाना चाहती तो इसे सबसे पहले पार्टी में लागू किया जाना चाहिये था. तो कुछ प्रयोग करने तय किये गए. उदाहरन के तोर पे उम्मीदवार जनता से पुछकर तय करना. दिल्ली चुनाव से पहले आंतरिक चुनाव करवाए गए जिसकी गिनती का किसी को पता नहीं चला. उम्मीदवार PAC नामक हाई कमांड ने तय किये.

दिल्ली चुनाव बीते. सफलता ने नेताओं ले दिलोदिमाग पे अपना असर दिखाना शुरू किया. अब उम्मीदवार सीधे उपर से भेजे जाने लगे. (एक इंटरव्यू वाली प्रक्रिया भी थी जिकसी चर्चा थोड़ी देर में करता हूँ)

कई जगह छोटी या मोटी बगावत हुयी.

उदाहरन के तोर पे हिसार. 90% से ज्यादा लोग वहां से घोषित प्रत्याशी से सहमत नहीं थे. स्वराज के अनुसार ये फेसला हिसार के लोगों पे छोड़ दिया जाना चाहिए था या उनके ऐतराज के बाद बिना देरी किये प्रत्याशी बदल दिया जाना चाहिए था. पर हाई कमांड ने इसे नाक का सवाल बना लिया. इस बीच उस स्वराज के नारे का मजाक बनता रहा.

एक और उदाहरण के तोर पे चंडीगढ़. यहाँ पार्टी पे दो अच्छे उम्म्द्वर सविता भटठी और गुल पनाग के रूप ,इ दिए लेकिन तरीका फिर वही था, सीधे हाई कमांड द्वारा थोप दिए गये. स्वराज के अनुसार कम से कम चंडीगढ़ वालो को पहले विश्वास में तो लिया ही जाना चाहिए था.

उम्मीदवार चयन से हटकर भी देखें तो भी पार्टी में कहीं भी किसी भी स्तर पे स्वराज नाम की चिड़िया ढूंढे नहीं मिलती.

अरविन्द ने एक किताब भी लिखी. 2010 के दोरान उसी को पढके मैंने अरविन्द का साथ देने का निर्णय किया था. अब मुझे वक्तिगत तोर पे लगता है की अरविन्द स्वराज में कोई विश्वास नहीं रखते. किताब भी शायद कहीं से कॉपी पेस्ट थी.

 धर्म और जाती की राजनीती

कांग्रेस बीजेपी सपा बसपा टाइप सभी दल यह राजनीती करते थे/हैं/रहेंगे

पर नया दल तो नए तरीके की बात करता था. पर जल्दी ही नयी हाई कमांड ने भी इस जरुरत को समझ लिया. कांग्रेस ख़तम हो रही थी और मोदी उभर रहे थे. जल्दी इस बात का आभाष हो गया था की अगली जंग में हमें किसका सामना करना है. मोदी कट्टर हिंदूवादी चेहरा थे. तो दूरगामी योजना बनी दुसरे सबसे बड़े धरम मुश्लिमों को साथ लेने की. दूरगामी और सही फैसला था. पर जल्दबाजी में नेता जी खुद को कोर्ट से उपर मानते हुवे बतला हाउस और कुछ अन्य एनकाउंटर पे ज्यादा बोल गए. लेकिन ये सब पक्ष में जा रहा था. छोटी गलतियाँ थी तो कोई ध्यान भी नहीं दे रहा था.

बीते दिनों राजनीती में माहिर कहे जाने वाले योगेंदर यादव जी का नया रूप सामने आया. इस नए रूप के लिए उन्होंने मेवात को चुना. मेवात में दो खासियत हैं. एक तो वो मुश्लिम बहुल है और दूसरा यादव की के निर्वाचन छेत्र का हिस्सा है.

यादव जी ने मुश्लिमों के बीच कहा : "मेरा बचपन का नाम सलीम है, पापा भी इसी नाम से बुलाते थे, योगेंदर नाम थोडा लम्बा हो जाता है, आप मुझे सलीम बुलाया कीजिये, ये नाम मेरे दिल के करीब है"

कार्यकर्ताओं को भी हिदायत दी गयी की मेवात इलाके में उनका नाम सलीम लिया जाए.

बात बाहर पहुंची, विवाद शुरू होने से पहले ही चतुर योगेंदर जी बचाव तैयार कर लाये की सलीम उनका बचपन का नाम था जो की सच भी है. किसी का अलग या निक नाम हो सकता है, वो किसी मुस्लिम नाम से  मिलता भी हो सकता है. इसमें कोई बुराई नहीं. हो सकता है सलीम नाम उनके दिल के करीब हो, इसमें भी कोई बुराई नहीं.

बुराई उस नाम के सियासी इस्टेमाल में है. अगर आपको अपना सलीम नाम पसंद है तो आप दिल्ली, जंतर मंतर, या मिडिया में या टीवी पे किसी दिन बताते की आपको योगेन्द्र नाम लम्बा लगता है तो आपको सलीम बुलाया जाए. पर आपने वोटों की खातिर इसको बड़ी चतुराई से वहां इस्तेमाल किया जहाँ फायदा दिखा.

 पार्टी हिन्दू मुश्लिम को बराबर समझे ये काबिलेतारीफ है, पर वोटों के लिए इस तरह के हथकंडे शर्मनाक है.

चुनाव साफ़ धन से लड़ने का वादा

यह पार्टी का ट्रम्प कार्ड साबित हुवा. शायद दुनिया में अपनी तरह का पहला प्रयोग.

पार्टी अपने चंदे और खर्चे का हिसाब पारदर्शी ढंग से रखती है.

बीच में पता चला कि नकद में काम भी चल रहा है जिसका कोई हिसाब नहीं और वो भी करोड़ों में. लेकिन उसपे जयादा यकीं नहीं था. कुछ मात्रा  में हो भी सकता है. लेकिन पार्टी का प्रयास इस मामले में पूरी पारदर्शीता का है जो सराहनीय है.

दिल्ली चुनाव के बाद दोबारा से पार्टी अब तक करीब 22 करोड़ जुटा चुकी है.

पर चोंकाने वाली बात यह है की यह धन किसी भी उम्मीदवार को आवंटित नहीं होगा. पार्टी उम्मीदवारों को अपने खर्च पे चुनाव लड़ने या अपने स्तर पे धन जुटाने का आदेश दे चुकी है. यानी जो तरीका उम्मीदवार अपने चुनाव खर्च के लिए अन्य पार्टियों में इस्तेमाल करते हैं , लगभग वही तरीका "आप" वालों को भी इस्तेमाल करना होगा. कुछ बड़े चंदे का अहसान उम्मीदवारों को लेना होगा जो बाद में चुकाना भी होगा.

एक और चोंकाने वाली बात यह है की पार्टी जब टिकेट के इच्छुक उम्मीदवारों के इंटरव्यू ले रही थी तो सबसे पहला सवाल धन सम्बंधित था. पहला सवाल था की आप पैसा कितना खर्च करेंगे. कुछ अपवादों को छोडकर खर्च कर पाने की क्षमता को वरीयता मिली.

"अच्छे" और जितने/पैसा लगाने में "सक्षम" में फरक होता है. हो सकता है अच्छा सक्षम भी हो और हो सकता है अच्छा हो लेकिन सक्षम ना हो. पर वरीयता उसको मिली जो सक्षम था. (कुछ अपवाद भी हैं)


उपर की चर्चा इस बात पे थी की क्यूँ मुझे लगता है की ये वो पार्टी नहीं है जो शुरू में बनायीं गयी थी. बहुत थोड़े से कारण मैंने बताये, असल में और बहुत कुछ है जो अभी इसलिए खुले में नहीं लिखना चाहता की थोड़ी सी ही सही उम्मीद अब भी बाकी है.

आम चुनाव

अब आम चुनाव सर पे खड़े हैं. आप "आप" की कमी निकल के पुराने टाइप की तरफ देखेंगे या अभी भी "आप" को मोका देंगे. ये सवाल आते ही असली कोफ्त होती है. कांग्रेस बीजेपी टाइप का ख्याल आते ही लगता है कि "आप" अभी भी उतनी बुरी नहीं है


लेकिन गोर से सोचें तो सवा सो साल पहले कांग्रेस देशभक्तों ने ही बनायीं थी. कुछ दसक पहले बीजेपी को भी देशभक्तों में बनाया. सपा, राजद, जेडीयू ये सब भी आंदोलनों से ही निकली.

असल में कोई पार्टी बुरी नहीं होती. पार्टी बुरी तब बन जाती हैं जब मूल भावना खोने लगती है और बुराइयां घुसने लगती हैं. कांग्रेस को आज की डरावनी कांग्रेस बन्ने में शताब्दी से ज्यादा समय लगा. बीजेपी को कुछ दशक का. सपा राजद जेडीयू को भी. लेकिन "आप" तो लगता है की दो तीन साल में ही बाकियों से बुरी बन्ने की होड़ में है.

अब लगभग ये तय हो चूका है की देश को अगले कुछ साल मोदी जी का दंस झेलना पड़ेगा. और मुझे इसके लिए "आप" हाई कमांड का घमंड और गलत नीतिया जिम्मेदार दिखती हैं. "आप" कुछ महीने पहले तक मोदी को रोक पाने की सतिथि में थी. अपनी सरकार भले न बनती पर मोदी का रथ रुक सकता था. लेकिन एक के बाद एक चमचो को टिकेट मिले, कई बड़े नेता संगठन मजबूत करने की जगह संगठन में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटे रहे. पुराने आन्दोलनकारी साथी दूर हट गए. रही सही कसर बिकाऊ मीडिया ने दिन रात "आप" के खिलाफ बेसिरपैर की कहानियां सूना के पूरी कर दी.

आप सहमत हो या नहीं पर मुझे पार्टी मात्र 18 सीटों पे ही लडाई में दिखती है, जीतेगी कितनी पता नहीं.

हाँ पार्टी कुछ ऐसे चेहरों को संसद में भेजने में जरुर कामयाब हो जाएगी जो इस पार्टी के आने से पहले हम नहीं सोच सकते है. साथ ही अच्छे वोट शेयर से रास्ट्रीय पार्टी का दर्जा भी पा जाएगी.

थोड़ी देर पहले किसी साथी ने पूछा की "आप" की हार से फायदा किसका है. मेरा जवाब था "आप" का.

मान लो अगर "आप" 100 सीटें जीत गयी तो आप के नेता कहेंगे की उनके तरीके नीतियाँ और रणनीतियां सब सही थे. क्यूंकि फिलहाल उनके लिए जीत के नतीजे सिद्धांतों से कहीं ज्यादा मायने रखता हैं.

पर यही पार्टी 10-15 पे रह जाती है, तो जीत को महतवपूर्ण सम्झने वाली टोली कमजोर पड जाएगी. तब अरविन्द गहरे मंथन को मजबूर होंगे. उसी सूरत में पार्टी सिद्धांतों की और वापस लोट सकती है.

आज बहुत लिख चूका. शायद ज्यादातर पाठक इतना नीचे तक पहुंचे भी नहीं हो और उबकर बीच में छोड गए हो.


चलते चलते ख्यालिया का जिक्र जरुर करूँगा. पर्याप्त तथ्य इस बात के हैं की वो सही आदमी नहीं है और इस बात के भी कि किस तरह योगेन्द्र यादव ने तानाशाही से उसको उम्मीदवार बनवाया. पर मुझे ज्यादा दुःख इस बात को जान के लगा की निजी बातचीत में अरविन्द ने भी मान लिया कि यह सही आदमी नहीं है. अरविन्द ने कुछ कार्यकर्ताओं से निजी बातचीत में कहा "हिसार मेरा घर है, मैंने अपने कई रिश्तेदारों से पुछा तो सबका कहना था की ख्यालिया बेईमान आदमी है. पर फिर भी मेरी मज़बूरी है"

क्यूंकि ये निजी बातचीत थी इसलिए मैं साबित नहीं कर सकता. लेकिन अरविन्द इसको मेरी आँखों में आँख डालकर ख़ारिज भी नहीं कर सकते. मुझे उनकी मज़बूरी समझ नहीं आती की योगेन्द्र से इतना डर क्यूँ है.


अब साथी आकर कई तरह से समझाते हैं. मैं इतना ही कहता हूँ "हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन, दिल को बहलाने का ख्याल ये ग़ालिब अच्छा है"

निजी तोर पे अरविन्द अब मेरे दिल से  पहले वाली जगह खो चुके हैं, लेकिन बड़ा सवाल देश का है.

अगली लोकसभा भी देश को शर्मशार ही करेगी इसमें शक नहीं. लेकिन कुछ अच्छे लोग हम संसद में भेज सकते हैं इसका मोका इस नयी पार्टी ने जरुर दे दिया है, उनका साथ दें. लेकिन ज्यादा उम्मीदें भी ना पालें

जय हिन्द

Friday, March 8, 2013

अखिलेश आखिर क्यूँ पिटा ?

सुबह से लालबाग मॉडल टाउन कइ गलियों में घूमकर समजना चाहता था की आखिर अखिलेश पीटा  क्यूँ ?

लोगों से बात की और झुग्गियों में देखा तो पता चला कुछ बातों का. यहाँ बिजली पानी नाली गली सफाई जेसे अनगिनत मुद्दों पर आम आदमी लगातार परेशांन है . अखिलेश और अन्य साथी यहाँ लगातार आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे थे . जिसका असर इस झुग्गी में नजर भी आ रहा था  . जिन भी झुग्गियों मे पिछले दिनों मैं गया उनसे बेहतर सफाई व्यवस्था यहाँ है पर फिर भी ये इंसान के रहने के लायक जगह कहीं से भी नहीं लगती है .

बीती चोबीस फ़रवरी को यहाँ अरविन्द जी की जनसभा थी जिसमे आम आदमी का हुजूम उमड़ पड़ा था . मैंने आज झुग्गिन्यों के अन्दर और उपर जाकर देखा की केसे वहां अरविंद के पोस्टर लगे पड़े थे.

ये सब देखकर यहाँ की भ्रस्ठ पार्टियों और नेताओं की नींद उड़ना लाज़मी थी .   इसी कुंठा में सायद मोका पाकर उन्होंने कल रात अखिलेश को घेरा और मारा .

सबसे बड़ी बात यह रही की गुंडों को मारने के लिए लाठी दो पोलिस वालों ने दी  . सारी  पार्टियों  का गुंडों और पोलिस से मिलकर यह तांडव क्या आप बर्दास्त करेंगे . फैसला आपको करना है.

Friday, October 14, 2011

Mayawati's 685-crore memorial park

Whether Mayawati's 685-crore memorial park, inaugurated in Noida today, is worth it. i am not saying anything. just sharing few responses from people



Amit: I am always in favour of parks in big cities, but when I came to know that more than 6000 trees were cut and a bird sanctuary was destroyed I was very upset, any ways good luck to people of Lucknow for the new park. I also plan to have my statue in front of my company office.

Pavan: Looking at the pictures posted, it seems like Mayawati has spent public money for publicising her party symbol. What was the need to have so many statues? This is the lesson for UP voters, if you keep repeating the mistake, Mayawati will make world record for number of statues of built of her own.

H L Kaul: There was a recent report that 0.7 bed are available for every 1000 patients in hospitals in India. Better sense should have prevailed on Mayawati and a new hospital should have been built with all modern facilities so as to accommodate the poor and Dalit patients needing urgent health care.

Indian: If it's to attract tourist then it's worth it.

Poonam: I think Mayawati has done a great job. She has helped to make Noida green. If people open their eyes, the can see the better side of it.

Sravan: Absolutely worthful, governance also includes heritage.

Sritharan: This will be the fate our nation, if we failed to elect the right people for the right job. Maya missed a golden opportunity to uplift her own people. She has wasted 'taxpayer's money and not her own!

Amol Chaturvedi: What a shame! Not a single word about encephalitis. I think it would have been a better option to setup an industry and giving reservation to deserved ones rather spending 685 crores for a park.

Soumen Das: It's definitely good to have parks for urban life but the price tag of 685 crore is too high to afford for a state like UP where the basic needs of common people like health, education etc. are in dire straits.

Harish: It is totally a waste of money, instead of hi-tech park, school or hospital could have built.

Wednesday, May 4, 2011

You need to be S.M.A.R.T.....



A keen immigrant Indian Marwadi lad applied for a salesman's job at London 's premier downtown department store. In fact, it was the biggest store in the world - you could get anything there.


The boss asked him, "Have you ever been a salesman before?" "Yes sir, I was a salesman in India ", replied the lad. The boss liked the
cut of him and said, "You can start tomorrow and I'll come and see you."


The day was long and arduous for the young man, but he got through it. And finally 6:00 PM came around. The boss duly fronted up and asked,
"How many sales did you make today?" "Sir, Just ONE sale." said the young salesman. "Only one sale?" blurted the boss. "No! No! You see here, most of my staff make 20 or 30 sales a day. "If you want to keep this
job, you'd better be doing better than just one sale. By the way "How much was the sale worth?"




= 93300534.00 pounds" said the young Marwadi. "What"," How did you manage that?" asked the flabbergasted boss.




"Well", said the salesman, "This man came in and I sold him a small fish hook, then a medium hook and finally a really large hook. Then I sell him new fishing rod and some fishing gear. Then I asked him where
he was going fishing and he said down the coast. So I told him he'd be needing a boat, so I took him down to the boat department and sold him that twenty-foot schooner with the twin engines. Then he said his Volkswagen probably wouldn't be able to pull it, so I took him to our automotive department and sold him that new Deluxe 4X4 Blazer.


I then asked him where he'll be staying, and since he had no accommodation, I took him to camping department and sold him one of those new igloo 6-sleeper camper tents. Then the guy said, while we're at it, I should throw in about $100 worth of groceries and two cases of beer.



The boss took two steps back and asked in astonishment, "You sold all that to a guy who came in for a fish hook!!"


"No" answered the salesman, "he came in to buy a headache relief tablet and I said to him, "Sir, fishing is best headache pain removal"


Boss - "You sit in my chair.......


Thursday, April 28, 2011

अन्ना की अनकही कहानी by देविंदर शर्मा

पांच अप्रैल से अन्ना हजारे सुर्खियों में बने हुए हैं। बौद्धिक तबके में उन पर चर्चा व बहस छिड़ी है और तरह-तरह के आरोप व लांछन लगाए जा रहे हैं। लोकपाल बिल की रूपरेखा तैयार करने के लिए संयुक्त मसौदा समिति का गठन अंतहीन बहस के बाद हुआ है। अन्ना हजारे उन लोगों के हमलों का शिकार बने हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा कानून बनने से इसलिए डरे हुए हैं कि उनकी असीम शक्तियों पर अंकुश लग जाएगा। जिस तरह चौतरफा हमले हो रहे हैं, मैं खुद को भी अन्ना के साथ इन हमलों के बीच में पाता हूं। बीच में इसलिए क्योंकि मैं भी इंडिया अगेंस्ट करप्शन का संस्थापक सदस्य हूं और राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में इस छोटे किंतु प्रभावी समूह के साथ हूं। एक ऐसे समय जब मजबूत लोकपाल बिल को निशाना बनाने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं और ऐसा करने वालों में नागरिक समाज के कुछ जाने-पहचाने चेहरे भी शामिल हैं, मुझे लगता है कि अब विस्तार से बताने का समय आ गया है कि अन्ना हजारे की मुहिम कैसे परवान चढ़ी। आरटीआइ कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने मुझे फोन किया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल होना चाहूंगा। जब उन्होंने विस्तार से बताया कि वह राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के दिग्गजों के खिलाफ एफआइआर दायर करना चाहते हैं तो मैं सहमत हो गया। हम दोनों एक-दूसरे के काम की सराहना करते हैं और संभवत: अरविंद जानते थे कि मैं उनके साथ काम करना पसंद करूंगा। मुझे भी यह विचार जंच गया। मैं कॉफी पीते हुए महज बहसबाजी करने वालों के बजाए ऐसे लोगों को पसंद करता हूं जो वास्तविक धरातल पर काम करते हों। अरविंद ने नागरिक समाज के कुछ जाने-पहचाने और भरोसेमंद लोगों से भी संपर्क साधा। वह प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और पूर्व पुलिस ऑफिसर किरण बेदी से भी मिले। किरण बेदी ने सलाह दी कि समूह को स्वामी रामदेव का समर्थन भी हासिल करना चाहिए। मेरी जानकारी के मुताबिक किरण बेदी ने स्वामी रामदेव से बात की और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम की सराहना करते हुए उनसे अभियान से जुड़ने का आग्रह किया। राष्ट्रमंडल खेल भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में स्वामी रामदेव के जुड़ने से इसमें नई जान पड़ गई। किंतु यह तो शुरुआत भर थी। इस बीच, हम श्री श्री रविशंकर और दिल्ली के आर्कबिशप के पास पहुंचे। दोनों समर्थन के लिए सहमत हो गए। इसके बाद मैंने पंजाब में बाबा सींचेवाल से बात की और वह भी समर्थन के लिए तैयार हो गए। हम महज आध्यात्मिक नेताओं की ही नहीं, बल्कि समाज के तमाम वर्गो के ईमानदार चेहरों से इस अभियान से जुड़ने की अपील कर रहे थे। संख्या बढ़ती चली गई। इन प्रयासों के बीच अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी बड़े मनोयोग से एफआइआर का मसौदा तैयार करने में जुटे थे। मैं उनके काम को देखकर हैरान था। 370 पेज की एफआइआर तैयार थी, जिसे जंतर-मंतर पुलिस स्टेशन के एसएचओ को सौंप दिया गया। जंतर-मंतर पर मिला जनसमर्थन हमारी उम्मीद से कहीं बढ़कर था। पिछले कुछ सालों में मैंने दिल्ली के बीचोंबीच स्थित जंतर-मंतर पर इतनी बड़ी रैली नहीं देखी। हमें उन लोगों को इसका श्रेय देना नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने इस मुहिम को परवान चढ़ाया। स्वामी रामदेव के भारत स्वाभिमान संगठन ने दिल्ली पहुंचने का आह्वान किया और बड़ी संख्या में उनके अनुयायी वहां पहुंचे। दिल्ली के आर्कबिशप ने भी भारी संख्या में अपने अनुयायियों को वहां भेजा। जंतर-मंतर रैली में स्वामी रामदेव प्रमुख वक्ता के तौर पर मौजूद थे। अन्ना हजारे भी मंच पर उपस्थित थे। वहीं पर अन्ना हजारे ने स्वामी रामदेव से कहा कि वह (अन्ना) पिछले कई बरसों से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करते आ रहे थे, किंतु अब जाकर उन्हें लगा है कि यह संघर्ष तार्किक परिणति पर पहुंचेगा। अन्ना ने उत्साह से बताया कि किस तरह वह महाराष्ट्र में छह मंत्रियों और चार सौ से अधिक अधिकारियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने अनथक आंदोलन से हटवा चुके हैं। कुछ सप्ताह के भीतर ही, श्री श्री रविशंकर ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इस अभियान को समर्थन देने की घोषणा की। भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत खड़ा हो चुका था। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ अभूतपूर्व अभियान का खुला भाग था। इसका छिपा हुआ भाग टीवी कैमरों के फोकस में नहीं आया। इस बीच अरविंद केजरीवाल का दफ्तर एक युद्ध कक्ष में तब्दील हो चुका था। उन्होंने जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने में दिन-रात एक कर दिए। इसमें बार-बार संशोधन किए गए। उन्होंने तमाम आगंतुकों का स्वागत किया, अनगिनत फोन सुने, एसएमएस किए और फेसबुक तथा इंटरनेट पर टिप्पणियां लिखीं। उन्होंने बैनर और नारेबाजी की तख्तियां तैयार कीं और अनेक बैठकों को संचालित किया। भारी संख्या में स्वयंसेवकों ने इसमें भाग लेकर सराहनीय कार्य किया। आप समझ ही रहे होंगे कि यह आसान काम नहीं था। यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि जिस व्यक्ति, अरविंद केजरीवाल, ने आगे बढ़कर इसका नेतृत्व किया, वह ऊंचे मानकों व मूल्यों वाला था। इस बीच शांति भूषण, प्रशांत भूषण और संतोष हेगड़े की सलाह से जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने पर काम चलता रहा। किरण बेदी, स्वामी अग्निवेश और कभी-कभी मैंने भी इसमें सुझाव दिए किंतु इसमें असल मेहनत उन्हीं की रही। इसीलिए जब संयुक्त समिति का मुद्दा उठा तो इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने उन्हीं लोगों को प्रतिनिधित्व दिया, जो इसका मसौदा तैयार करने में शामिल थे। वापस जन एफआइआर पर आएं तो जो एफआइआर जंतर-मंतर के एसएचओ ने हमसे स्वीकार की थी, उसे दर्ज नहीं किया गया। ऐसा संभवत: पहली बार हुआ कि जनता द्वारा एफआईआर दर्ज करने के विचार से कुछ शक्तिशाली लोग खुश नहीं थे। हम अदालत में अपील करने की सोच ही रहे थे कि वह पुलिस को एफआइआर दर्ज करने के निर्देश दे, किंतु इसी बीच हमारा ध्यान आदर्श हाउसिंग घोटाला और 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे बड़े मुद्दों पर केंद्रित हो गया। रामलीला ग्राउंड में दो बड़ी रैलियों से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में हमारा मनोबल बढ़ा। जनमानस भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।

Friday, April 8, 2011

सवा अरब बेचारे और एक अन्ना हज़ारे by विनोद वर्मा

उम्मीदें जाग गई हैं. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?

माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर. अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है.

लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है. सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा.

जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में भी नहीं पहुँची है.

हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब. इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग भी जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे नहीं हो रहे हैं.

वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में.

मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी अपने आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम.

लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी. वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है.

भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है.

फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ सौ लोग.

ब्रिटेन से एक पत्रकार ने पूछा कि दिल्ली में ही एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं और जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं वो तो बहुत ज़्यादा नहीं है, तो क्या अभी लोगों को भ्रष्टाचार अपना मुद्दा नहीं लगता?

जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है. सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.

भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता.

उस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा.

ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को.

लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है.

लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं. लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन.

अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं.

भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता.

बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है.

सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी.

Thursday, April 7, 2011

सम्माननीय भारतवासियों,


सम्माननीय भारतवासियों,
सोनिया गाँधी और उनकी कम्पनी जन लोकपाल बिल को लागू क्यों नही कराती, यदि वे भ्रष्टाचार के बारे में थोड़े भी गंभीर है?
छोटे गाँधी यानि अन्ना हजारे जी से क्यों कह रहे है की अनशन करने से कुछ फायदा नहीं है?
सोनिया की समिति जिसमे शरद पवार, मोइली और कपिल सिब्बल है, ये क्या कानून बनायेगे जो खुद या तो भ्रष्टाचार में लिप्त है या भ्रष्टाचारियों का बचाव कर रहे है हैं,
ये वही कपिल सिब्बल है जो ये टीवी पर यह प्रचार कर रहे थे की भारत के महा लेखाकार गलत है, १७६००० करोड़ के २ जी घपले में कोई घपला नहीं हुआ है और सरकार को कोई धन हानि नहीं हुई है,
ये टीवी वाले थोड़ा और शर्म करके इस मुहीम को ठीक से जनता के बीच में प्रचारित करे:
जन लोकपाल बिल के मुख्य बिंदु इस प्रकार है, जिससे सरकार को डर लगता है , खासकर सोनिया को:
१- अब तक घोटाला करने वाले को सिर्फ अदालत का चक्कर कटवाया जाता था लेकिन लूटा हुआ धन वापस लेने की कोई व्यवस्था नही थी, इस जन लोकपाल बिल में भ्रष्टाचारी से पूरा पैसा वसूल करने की व्यवस्था की गयी है तो सोनिया और मनमोहन को आपत्ति क्यों है, सांच को आंच क्यों?
२- पहले घपले बाजों को सिर्फ ६ महीने से लेकर ५ साल की सजा थी जो की २ जी में भी लागु होगी, अब जन लोकपाल बिल में ५ साल से आजीवन कारावास की सजा का प्राविधान है, बाबा रामदेवजी तो फांसी की सजा की बात कर रहे हैं, सजा को कड़ी होनी ही चाहिए,
३- जन लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को भी बिना अनुमति जांच के दायरे में ला दिया है, इसमे क्या गलत है.
४- जन लोकपाल बिल में लोकपाल को मुकदमा चलाने और सजा देने का भी अधिकार दिया गया है, जिसके लिए उसे किसी से कोई पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नही है, इसमे क्यों परेशानी है, मनमोहन तो काफी ईमानदार क्यक्ति हैं, सोनिया भी शायद हैं तो फिर कड़े कानून से किसे डरना चाहिए?
५- जन लोकपाल बिल में मुकदमा लंबा नही खीचा जा सकता है, यह तो बहुत अच्छी बात है,
६- जन लोकपाल बिल में कोई भी आदमी शिकायत कर सकता है और बिना खुली सुनवाई के मामला बंद नही होगा, इसमे क्या गलत है,
७- शिकायत करता की सुरक्षा का जिम्मा लोकायुक्त की रहेगी, अब तक शिकायत करता को ही फंसा दिया जाता था.
बाकी इसमे ऐसे ही बहुत सारे प्राविधान है, जिसका आम जनता बिना किसी परेशानी के समर्थन कर रही है, तो सरकार को तो खुश होना चाहिए की जनता स्वयं कडा कानून चाहती है.
यदि आप अन्ना हजारे जी के इस ५ अप्रैल से शुरू किये गए आमरण अनशन का समर्थन करते है तो इसे अपने सभी जानने वालो को प्रेषित करे.
वन्दे मातरम