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पीठ खुजाने की कला
इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता. हिमालय पर चढ़ने को उसने बच्चों को खेल बना लिया है और अब चाँद पर बस्तियाँ बसाने की योजना चल रही है.
उसने सुपर कंप्यूटर बना लिए और ईमेल के ज़रिए दुनिया को गाँव जैसा छोटा बना दिया.
उसने मोबाइल को इतना सुलभ बना दिया कि उनकी संख्या शौचालयों से ज़्यादा हो गई और फ़ोन टैपिंग को इतना आसान कर दिया कि सरकार को कानों कान ख़बर हुए बिना फ़ोन टैप हुए जा रहे हैं.
लेकिन वह अपनी पीठ अब भी ख़ुद नहीं खुजा सकता. इसके लिए दूसरों की ज़रुरत होती है.
निजी तौर पर लोग ऐसा करते होंगे तो दिखता नहीं लेकिन दफ़्तरों में, सरकारों में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा होता है तो साफ़ दिखता है.
इससे पीठ वाले और पीठ खुजाने वाले दोनों को फ़ायदा होता है क्योंकि दोनों की भूमिका बदलती रहती है.
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि 1984 के दंगों के लिए सिर्फ़ सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने कांग्रेस की पीठ खुजाई. अब वे उम्मीद करेंगे कि बदले में कांग्रेस किसी समय कहे कि गोधरा के बाद के दंगों के लिए सिर्फ़ मोदी सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
इससे थोड़े दिन पहले संसद में एक अद्बुत नज़ारा देखने को मिला था जब भाजपा के लोग खड़े होकर यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम की तारीफ़ कर रहे थे.
नक्सलियों ने सीआरपीएफ़ के 76 जवानों को मार दिया था और भाजपा के लोग गृहमंत्री की तारीफ़ कर रहे थे. कई लोगों को समझ में नहीं आया. लेकिन जो जानते थे वे समझ गए कि पीठ खुजाई जा रही है.
इसके बाद कांग्रेस ने भाजपा की पीठ खुजाई. वह कम ही लोगों को दिखाई दी. लेकिन भाजपा के लोगों को महसूस हुआ. सुकून भी मिला. बदले में कांग्रेस ने एक बार भी नहीं कहा कि छत्तीसगढ़ में भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं.
आईपीएल का पूरा विवाद ही पीठ खुजाने का था. मंत्री ने कहा कि मेरी दोस्त को एक टीम दे दो. आईपीएल के कमिश्नर ने ऐसा कर दिया. मंत्री ने पीठ आगे की तो आईपीएल कमिश्नर ने खुजा दी. फिर आईपीएल कमिश्नर ने कहा कि फलाँ कन्या को भारत मत आने देना. मंत्री समझ नहीं पाए. आने दिया. पीठ सामने थी लेकिन खुजाने से इनकार कर दिया. तो लो अब भुगतो.
ललित मोदी ने तीन साल तक अपने फ़्रैंजाइज़ियों की पीठ खूब खुजाई. वे टीम की मिल्कियत में गोलमाल करते रहे. इधर-उधर से पैसा कबाड़ते रहे. खेल के पीछे कई खेल करते रहे. लेकिन मोदी साहब चुप रहे. वे पीठ खुजा रहे थे. इसलिए जब मोदी मुसीबत में पड़े तो सारे मालिक अपने नाखून सजाकर सामने आ गए. टेलीविज़न कैमरों के सामने मोदी की पीठ खुजाने लगे.
यूपीए सरकार संकट में दिख रही थी. लग रहा था कि अब पीठ दिखाकर भागना होगा. लेकिन मायावती ने पीठ खुजाकर कहा, चिंता मत करो. उसने कटौती प्रस्ताव पर सरकार को समर्थन की घोषणा कर दी.
अब सरकार की चिंता है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में, ताज कॉरिडोर के मामले में वह मायावती की पीठ कैसे खुजाएगी. हो सकता है कि मायावती कहें कि मेरी पीठ खुजाने का अच्छा तरीक़ा यह है कि राहुल गाँधी को उत्तर प्रदेश भेजना बंद करो.
अनगिनत क़िस्से हैं पीठ खुजाने के.
दफ़्तर में कोई तारीफ़ करे तो मन में हो रही गुदगुदी को संभालिएगा. हो सकता है कि वह आपकी पीठ खुजा रहा हो और जब मौक़ा आएगा अपनी पीठ आपके सामने कर देगा.
पीठ खुजाना बुरी बात नहीं है. यह एक कला है. इसमें पारस्परिक तरक़्की और लाभ का राज़ छिपा है.
बेहतर है आप भी इस कला में पारंगत हो जाइए.
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