Thursday, April 28, 2011

अन्ना की अनकही कहानी by देविंदर शर्मा

पांच अप्रैल से अन्ना हजारे सुर्खियों में बने हुए हैं। बौद्धिक तबके में उन पर चर्चा व बहस छिड़ी है और तरह-तरह के आरोप व लांछन लगाए जा रहे हैं। लोकपाल बिल की रूपरेखा तैयार करने के लिए संयुक्त मसौदा समिति का गठन अंतहीन बहस के बाद हुआ है। अन्ना हजारे उन लोगों के हमलों का शिकार बने हैं, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा कानून बनने से इसलिए डरे हुए हैं कि उनकी असीम शक्तियों पर अंकुश लग जाएगा। जिस तरह चौतरफा हमले हो रहे हैं, मैं खुद को भी अन्ना के साथ इन हमलों के बीच में पाता हूं। बीच में इसलिए क्योंकि मैं भी इंडिया अगेंस्ट करप्शन का संस्थापक सदस्य हूं और राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में इस छोटे किंतु प्रभावी समूह के साथ हूं। एक ऐसे समय जब मजबूत लोकपाल बिल को निशाना बनाने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं और ऐसा करने वालों में नागरिक समाज के कुछ जाने-पहचाने चेहरे भी शामिल हैं, मुझे लगता है कि अब विस्तार से बताने का समय आ गया है कि अन्ना हजारे की मुहिम कैसे परवान चढ़ी। आरटीआइ कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने मुझे फोन किया। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल होना चाहूंगा। जब उन्होंने विस्तार से बताया कि वह राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के दिग्गजों के खिलाफ एफआइआर दायर करना चाहते हैं तो मैं सहमत हो गया। हम दोनों एक-दूसरे के काम की सराहना करते हैं और संभवत: अरविंद जानते थे कि मैं उनके साथ काम करना पसंद करूंगा। मुझे भी यह विचार जंच गया। मैं कॉफी पीते हुए महज बहसबाजी करने वालों के बजाए ऐसे लोगों को पसंद करता हूं जो वास्तविक धरातल पर काम करते हों। अरविंद ने नागरिक समाज के कुछ जाने-पहचाने और भरोसेमंद लोगों से भी संपर्क साधा। वह प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश और पूर्व पुलिस ऑफिसर किरण बेदी से भी मिले। किरण बेदी ने सलाह दी कि समूह को स्वामी रामदेव का समर्थन भी हासिल करना चाहिए। मेरी जानकारी के मुताबिक किरण बेदी ने स्वामी रामदेव से बात की और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी मुहिम की सराहना करते हुए उनसे अभियान से जुड़ने का आग्रह किया। राष्ट्रमंडल खेल भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान में स्वामी रामदेव के जुड़ने से इसमें नई जान पड़ गई। किंतु यह तो शुरुआत भर थी। इस बीच, हम श्री श्री रविशंकर और दिल्ली के आर्कबिशप के पास पहुंचे। दोनों समर्थन के लिए सहमत हो गए। इसके बाद मैंने पंजाब में बाबा सींचेवाल से बात की और वह भी समर्थन के लिए तैयार हो गए। हम महज आध्यात्मिक नेताओं की ही नहीं, बल्कि समाज के तमाम वर्गो के ईमानदार चेहरों से इस अभियान से जुड़ने की अपील कर रहे थे। संख्या बढ़ती चली गई। इन प्रयासों के बीच अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी बड़े मनोयोग से एफआइआर का मसौदा तैयार करने में जुटे थे। मैं उनके काम को देखकर हैरान था। 370 पेज की एफआइआर तैयार थी, जिसे जंतर-मंतर पुलिस स्टेशन के एसएचओ को सौंप दिया गया। जंतर-मंतर पर मिला जनसमर्थन हमारी उम्मीद से कहीं बढ़कर था। पिछले कुछ सालों में मैंने दिल्ली के बीचोंबीच स्थित जंतर-मंतर पर इतनी बड़ी रैली नहीं देखी। हमें उन लोगों को इसका श्रेय देना नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने इस मुहिम को परवान चढ़ाया। स्वामी रामदेव के भारत स्वाभिमान संगठन ने दिल्ली पहुंचने का आह्वान किया और बड़ी संख्या में उनके अनुयायी वहां पहुंचे। दिल्ली के आर्कबिशप ने भी भारी संख्या में अपने अनुयायियों को वहां भेजा। जंतर-मंतर रैली में स्वामी रामदेव प्रमुख वक्ता के तौर पर मौजूद थे। अन्ना हजारे भी मंच पर उपस्थित थे। वहीं पर अन्ना हजारे ने स्वामी रामदेव से कहा कि वह (अन्ना) पिछले कई बरसों से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करते आ रहे थे, किंतु अब जाकर उन्हें लगा है कि यह संघर्ष तार्किक परिणति पर पहुंचेगा। अन्ना ने उत्साह से बताया कि किस तरह वह महाराष्ट्र में छह मंत्रियों और चार सौ से अधिक अधिकारियों को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने अनथक आंदोलन से हटवा चुके हैं। कुछ सप्ताह के भीतर ही, श्री श्री रविशंकर ने एक प्रेस कांफ्रेंस में इस अभियान को समर्थन देने की घोषणा की। भ्रष्टाचार के खिलाफ भारत खड़ा हो चुका था। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ अभूतपूर्व अभियान का खुला भाग था। इसका छिपा हुआ भाग टीवी कैमरों के फोकस में नहीं आया। इस बीच अरविंद केजरीवाल का दफ्तर एक युद्ध कक्ष में तब्दील हो चुका था। उन्होंने जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने में दिन-रात एक कर दिए। इसमें बार-बार संशोधन किए गए। उन्होंने तमाम आगंतुकों का स्वागत किया, अनगिनत फोन सुने, एसएमएस किए और फेसबुक तथा इंटरनेट पर टिप्पणियां लिखीं। उन्होंने बैनर और नारेबाजी की तख्तियां तैयार कीं और अनेक बैठकों को संचालित किया। भारी संख्या में स्वयंसेवकों ने इसमें भाग लेकर सराहनीय कार्य किया। आप समझ ही रहे होंगे कि यह आसान काम नहीं था। यह इसलिए संभव हो पाया क्योंकि जिस व्यक्ति, अरविंद केजरीवाल, ने आगे बढ़कर इसका नेतृत्व किया, वह ऊंचे मानकों व मूल्यों वाला था। इस बीच शांति भूषण, प्रशांत भूषण और संतोष हेगड़े की सलाह से जन लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने पर काम चलता रहा। किरण बेदी, स्वामी अग्निवेश और कभी-कभी मैंने भी इसमें सुझाव दिए किंतु इसमें असल मेहनत उन्हीं की रही। इसीलिए जब संयुक्त समिति का मुद्दा उठा तो इंडिया अगेंस्ट करप्शन ने उन्हीं लोगों को प्रतिनिधित्व दिया, जो इसका मसौदा तैयार करने में शामिल थे। वापस जन एफआइआर पर आएं तो जो एफआइआर जंतर-मंतर के एसएचओ ने हमसे स्वीकार की थी, उसे दर्ज नहीं किया गया। ऐसा संभवत: पहली बार हुआ कि जनता द्वारा एफआईआर दर्ज करने के विचार से कुछ शक्तिशाली लोग खुश नहीं थे। हम अदालत में अपील करने की सोच ही रहे थे कि वह पुलिस को एफआइआर दर्ज करने के निर्देश दे, किंतु इसी बीच हमारा ध्यान आदर्श हाउसिंग घोटाला और 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले जैसे बड़े मुद्दों पर केंद्रित हो गया। रामलीला ग्राउंड में दो बड़ी रैलियों से भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष में हमारा मनोबल बढ़ा। जनमानस भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है।

Friday, April 8, 2011

सवा अरब बेचारे और एक अन्ना हज़ारे by विनोद वर्मा

उम्मीदें जाग गई हैं. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?

माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर. अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है.

लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है. सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा.

जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में भी नहीं पहुँची है.

हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब. इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग भी जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे नहीं हो रहे हैं.

वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में.

मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी अपने आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम.

लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी. वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है.

भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है.

फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ सौ लोग.

ब्रिटेन से एक पत्रकार ने पूछा कि दिल्ली में ही एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं और जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं वो तो बहुत ज़्यादा नहीं है, तो क्या अभी लोगों को भ्रष्टाचार अपना मुद्दा नहीं लगता?

जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है. सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.

भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता.

उस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा.

ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को.

लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है.

लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं. लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन.

अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं.

भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता.

बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है.

सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी.

Thursday, April 7, 2011

सम्माननीय भारतवासियों,


सम्माननीय भारतवासियों,
सोनिया गाँधी और उनकी कम्पनी जन लोकपाल बिल को लागू क्यों नही कराती, यदि वे भ्रष्टाचार के बारे में थोड़े भी गंभीर है?
छोटे गाँधी यानि अन्ना हजारे जी से क्यों कह रहे है की अनशन करने से कुछ फायदा नहीं है?
सोनिया की समिति जिसमे शरद पवार, मोइली और कपिल सिब्बल है, ये क्या कानून बनायेगे जो खुद या तो भ्रष्टाचार में लिप्त है या भ्रष्टाचारियों का बचाव कर रहे है हैं,
ये वही कपिल सिब्बल है जो ये टीवी पर यह प्रचार कर रहे थे की भारत के महा लेखाकार गलत है, १७६००० करोड़ के २ जी घपले में कोई घपला नहीं हुआ है और सरकार को कोई धन हानि नहीं हुई है,
ये टीवी वाले थोड़ा और शर्म करके इस मुहीम को ठीक से जनता के बीच में प्रचारित करे:
जन लोकपाल बिल के मुख्य बिंदु इस प्रकार है, जिससे सरकार को डर लगता है , खासकर सोनिया को:
१- अब तक घोटाला करने वाले को सिर्फ अदालत का चक्कर कटवाया जाता था लेकिन लूटा हुआ धन वापस लेने की कोई व्यवस्था नही थी, इस जन लोकपाल बिल में भ्रष्टाचारी से पूरा पैसा वसूल करने की व्यवस्था की गयी है तो सोनिया और मनमोहन को आपत्ति क्यों है, सांच को आंच क्यों?
२- पहले घपले बाजों को सिर्फ ६ महीने से लेकर ५ साल की सजा थी जो की २ जी में भी लागु होगी, अब जन लोकपाल बिल में ५ साल से आजीवन कारावास की सजा का प्राविधान है, बाबा रामदेवजी तो फांसी की सजा की बात कर रहे हैं, सजा को कड़ी होनी ही चाहिए,
३- जन लोकपाल बिल में प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को भी बिना अनुमति जांच के दायरे में ला दिया है, इसमे क्या गलत है.
४- जन लोकपाल बिल में लोकपाल को मुकदमा चलाने और सजा देने का भी अधिकार दिया गया है, जिसके लिए उसे किसी से कोई पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नही है, इसमे क्यों परेशानी है, मनमोहन तो काफी ईमानदार क्यक्ति हैं, सोनिया भी शायद हैं तो फिर कड़े कानून से किसे डरना चाहिए?
५- जन लोकपाल बिल में मुकदमा लंबा नही खीचा जा सकता है, यह तो बहुत अच्छी बात है,
६- जन लोकपाल बिल में कोई भी आदमी शिकायत कर सकता है और बिना खुली सुनवाई के मामला बंद नही होगा, इसमे क्या गलत है,
७- शिकायत करता की सुरक्षा का जिम्मा लोकायुक्त की रहेगी, अब तक शिकायत करता को ही फंसा दिया जाता था.
बाकी इसमे ऐसे ही बहुत सारे प्राविधान है, जिसका आम जनता बिना किसी परेशानी के समर्थन कर रही है, तो सरकार को तो खुश होना चाहिए की जनता स्वयं कडा कानून चाहती है.
यदि आप अन्ना हजारे जी के इस ५ अप्रैल से शुरू किये गए आमरण अनशन का समर्थन करते है तो इसे अपने सभी जानने वालो को प्रेषित करे.
वन्दे मातरम